विदिशा

संवाद से विवाद का समाधान ही रामकथा का मूल संदेश: स्वामी मैथिलीशरण

आनंदपुर डेस्क :

श्रीरामदास हनुमान ट्रस्ट द्वारा आयोजित हनुमान जी के पाटोत्सव महोत्सव के अंतर्गत चल रही रामकथा के दूसरे सोपान में स्वामी मैथिलीशरण जी महाराज ने संवाद के गूढ़ आध्यात्मिक महत्व को सरल और प्रभावशाली उदाहरणों के माध्यम से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि संवाद ही वह माध्यम है, जिससे विवाद समाप्त होकर समाधान और शरणागति का मार्ग प्रशस्त होता है, इसी कारण समस्त पुराणों में संवाद की परंपरा दिखाई देती है।

स्वामी जी ने लक्ष्मण–राम संवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि तुलसीदास कृत रामचरितमानस के अनेक रहस्य इन्हीं संवादों से उद्घाटित होते हैं। उन्होंने लक्ष्मण–परशुराम संवाद, अर्जुन–कृष्ण संवाद, हनुमान-विभीषण संवाद के उदाहरण देते हुए बताया कि जहां संवाद स्वीकार किया गया, वहां प्रेम, भक्ति और धर्म की स्थापना हुई, और जहां संवाद अस्वीकार हुआ, वहां लंका की भांति विनाश हुआ।
उन्होंने ब्रह्म तत्व की व्याख्या करते हुए कहा कि गेहूं के एक दाने से लेकर संत, गुरु और समस्त आकाश तक ब्रह्म एक ही है, उसके टुकड़े नहीं हो सकते। अज्ञानवश मनुष्य ब्रह्म को नाम, देश, काल और जाति में बांटकर विवाद खड़ा करता है, जबकि पूर्ण को देखने से विवाद समाप्त होकर संवाद का प्रारंभ होता है।

गीता प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए स्वामी मैथिलीशरण ने कहा कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अठारह अध्यायों में संपूर्ण ज्ञान प्रदान कर यह स्वतंत्रता दी कि वह विवेकपूर्वक निर्णय करे। अर्जुन का मोह, उसका समाधान और धर्मयुद्ध का निर्णय यह सब संवाद का ही परिणाम था। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह युद्ध केवल हस्तिनापुर के राज्य के लिए नहीं, बल्कि पृथ्वी पर धर्म स्थापना के लिए लड़ा गया।
स्वामी जी ने कहा कि साधक का सबसे बड़ा पुरुषार्थ भगवान की वाणी पर विश्वास करना है। जिज्ञासा और समाधान दोनों संवाद से ही संभव हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि नहीं, बल्कि कृपा दृष्टि प्रदान की, क्योंकि कृपा के बिना मनुष्य को दोष में गुण और गुण में दोष ही दिखाई देता है।

रामकथा के इस दूसरे सोपान में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और स्वामी मैथिलीशरण के विचारों को गहन भाव से श्रवण किया। कथा स्थल पर भक्ति, वैराग्य और आध्यात्मिक चेतना का वातावरण बना रहा।

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