विदिशा

अनोखी परंपराए: दशहरा के दिन कालादेव में पत्थर मार युद्ध, नटेरन नाभि में लगाया जाता हैं तेल, मंदसौर, उज्जैन में होती है महाराजा लंकापति रावण की पूजा

आनंदपुर डेस्क :

आज दशहरे के दिन देशभर के साथ ही मध्यप्रदेश में भी बड़े ही धूमधाम और उत्साह के साथ अनोखी परंपराओं के साथ मनाया जाता है कहीं स्थान ऐसे भी है जहां महाराजा लंकापति रावण का दहन नहीं, बल्कि पूजा की जाती है आज newsupdate24x7 पर पहली बार कुछ ऐसे ही रोचक परंपराओं से भरे स्थानों के बारे में जानेंगे।

पत्थर मार युद्ध, रावण की सेना राम भक्तो पर गोफान से मारते हैं पत्थर,

विदिशा जिला मुख्यालय से 130 किलोमीटर दूर ग्राम काला देव के मैदान में बुधवार काे दशहरे के दिन राम रावण की सेना एक दूसरे के आमने-सामने होगी। यहां मैदान में गोफन से पत्थर मार युद्ध हाेगा। इस अनोखे पत्थर मार युद्ध में राम सेना में ग्राम काला देव के निवासी और रावण सेना में आसपास के ग्रामीण इलाकों के भील अाैर बंजारा समुदाय के लोग शामिल होंगे। यह भील, बंजारा समाज के लोग गोफान चलाने में इतने माहिर होते हैं कि यदि निशाना साध कर किसी में गोफन से पत्थर मार दिया तो उसका बच पाना लगभग नामुमकिन होता है लेकिन आश्चर्य की बात यह है इन निशानेबाजों के पत्थर राम सेना को छू भी नहीं पाते। इस दशहरे को देखने के लिए ग्राम सहित आसपास के देखने के लिए आएंगे। शाम 4 बजे से दशहरा उत्सव शुरू होगा जो कि करीब 1 घंटे से अधिक पत्थर मार युद्ध हाेगा। 

यह जलाया नहीं पूजा जाता हैं लंकापति

नटेरन तहसील के रावण गांव में भी दशहरे के दिन लंकापति रावण का दहन नहीं किया जाता बल्कि यहां लंकापति रावण की पूजा अर्चना की जाती है और नाभि में तेल लगाया जाता है ताकि घाव पर मरहम पट्टी हो सके।  बताया जाता है कि जब भगवान राम और रावण का युद्ध हुआ था उस समय जो नाभि में घाब लगा था उस बाण के घाव गांव पर ग्राम के लोग तेल लगाकर मरहम पट्टी करते हैं ऐसी मान्यता बताई जाती है कि जब तक महाराजा रावण की नाभि में खाद्य तेल ना लगाया जाए तब तक गांव में किसी के यह तेल से भरी हुई कढ़ाई भी ठंडी ही रहती है इसीलिए शादी ब्याह में कड़ाही चढ़ाने से पहले बाबा रावण की नाभि में तेल लगाया जाता है और पूजा अर्चना की जाती है पूरे गांव में कोई भी शुभ कार्य करने से पहले लंकापति रावण की पूजा अर्चना की जाती है।  बाबा रावण की यहां तीसरी सदी की प्रतिमा लेटी हुई अवस्था में है। 

मंदसौर और चिकली में भी होती है पूजा, यहां मंदिर तक बना है। 

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में भी रावण को जलाया नहीं बल्कि पूजा की जाती है। 

वही उज्जैन जिले में भी महाराजा रावण का दहन नहीं किया जाता बल्कि  पूजा की जाती है रावण का यह स्थान उज्जैन जिले की चिखली गांव का है। गांव के जानकार बताते हैं कि रावण बाबा की मंदिर से पूर्व दिशा की ओर 3 किलोमीटर दूर एक बुधे  की पहड़ी है।

जिस पर एक दानव रहता था और वह महाराजा रावण से प्रतिदिन युद्ध करने कि चाहा लेकर लंका आता था लेकिन लंका की चकाचौंध देखकर उसका क्रोध शांत हो जाता था कुछ समय बीतने के पश्चात एक बार दरबार में लंकापति रावण ने पूछा तुम रोज दरबार में आते हो और बगैर कुछ कहे ही चले जाते हो आखिर इसका क्या कारण है तो उस राक्षस ने कहा कि महाराज में आप से युद्ध करने की चाह लेकर आता हूं लेकिन लंका की चकाचौंध देखकर मैं मेरा क्रोध शांत हो जाता हैं तो महाराजा रावण ने कहा कि तुम उसी पहाड़ी पर मेरी एक प्रतिमा बना लेना और मुझसे रोज युद्ध करना। लोगों ने प्रतिमा की महिमा को जानते हुए यहां पर मंदिर भी बनवा दिया

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