ग्वालियर

दिव्यांगता प्रमाण पत्रों को लेकर हाईकोर्ट हुआ सख्त कहा: सभी दिव्यांग अभ्यर्थियों की विस्तृत जांच कराए सरकार

जरूरी हो तो पुलिस की भी मदद लें

ग्वालियर डेस्क :

दिव्यांगता प्रमाण पत्र के आधार पर नाैकरी प्राप्त करने वाले सैकड़ों चयनित अभ्यर्थियों को मेडिकल बोर्ड से फिर से जांच करानी होगी। जस्टिस मिलिंग रमेश फड़के ने ग्वालियर निवासी धर्मेंद्र रावत की याचिका को खारिज करते हुए कहा – आयुक्त लोक शिक्षण संचालनालय का आदेश न्यायहित में है।

जांच करना जरूरी है, खासकर उनके लिए जो वास्तविक रूप से दिव्यांग हैं। ऐसे में सरकार के लिए ये बेहद जरूरी है कि वे ऐसे सभी उम्मीदवारों की विस्तृत जांच कराएं, जिन्होंने दिव्यांगता प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी प्राप्त की है। जरूरत पड़े तो इसमें पुलिस की भी मदद लें।

दरअसल, आयुक्त लोक शिक्षण संचालनालय अनुभा श्रीवास्तव ने 13 जून 2023 को एक आदेश जारी किया। इसे चुनौती देते हुए ग्वालियर निवासी धर्मेंद्र रावत ने मप्र हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच में याचिका दायर की। इसमें तर्क दिया गया कि 16 दिसंबर 2019 को ग्वालियर की मेडिकल अथॉरिटी ने दिव्यांगता प्रमाण पत्र (बहरेपन का) जारी किया।

ऐसे में एक बार नियुक्ति होने के बाद कानून में दिव्यांगता प्रमाण पत्र को पुन: जांचने या फिर मेडिकल बोर्ड के समक्ष टेस्ट देने का प्रावधान नहीं है। कोर्ट को बताया गया कि याचिकाकर्ता का विदिशा जिले के ब्लॉक लटेरी स्थित शासकीय विद्यालय में माध्यमिक शिक्षक के पद पर चयन हुआ है। वहीं, अतिरिक्त महाधिवक्ता विवेक खेडकर ने मुरैना में हुए फर्जीवाड़े की जानकारी दी, बताया कि लगभग 75 लोगों के खिलाफ फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्र मामले में एफआईआर दर्ज कराई गई है। सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।

ये आदेश जारी किया है आयुक्त ने:

आयुक्त ने आदेश में मुरैना जिले में दिव्यांग श्रेणी में हुई नियुक्तियों का हवाला देते हुए बताया कि कई दिव्यांगता प्रमाण पत्र मुरैना जिले से जारी होना नहीं पाया गया। इसी आधार पर प्रदेश के सभी जिलों को शिक्षा अधिकारियों को ये निर्देश दिया जाता है कि कि वे संबंधित सीएमएचओ के माध्यम से मेडिकल बोर्ड की बैठक आयोजित करवाएं । साथ ही चयनित अभ्यर्थियों को बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करना सुनिश्चित करें। जिनकी दिव्यांगता की पुष्टि 40 प्रतिशत या उसे अधिक होगी, केवल उनकी नियुक्ति ही मान्य की जाएगी। जिनकी दिव्यांगता मानक से कम होगी, उनकी नियुक्ति निरस्त करने के लिए प्रस्ताव भेजा जाए।

एक्सपर्ट: बैरा पद्धति से टेस्ट तो गड़बड़ी ना के बराबर

विशेषज्ञ डॉ. बृजेश शर्मा का कहना है पूर्व में केवल ऑडियोमेट्री द्वारा सर्टिफिकेट बनाए जाते थे। यह एक व्यक्तिपरक जांच होती है, जिसमें गड़बड़ी की संभावना ज्यादा रहती है। कारण – जांच रिपोर्ट अभ्यर्थी द्वारा दिए गए जवाब के आधार पर तैयार की जाती है। इसके चलते प्रमाण पत्र जारी करने में गड़बड़ी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं, कुछ समय से बैरा (द ब्रेन स्टेम इवोक्ड रिस्पोंस ऑडियोमेट्री) पद्धति से टेस्ट किया जाता है। ये एक सेंसर आधारित टेस्ट होता है, जिसमें गड़बड़ी की संभावना ना के बराबर रहती है।

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