मानव सेवा का जज्बा: लावारिस, बीमार, मानसिक रोगी, बुजुर्गों की करते हैं सेवा, हजारों अज्ञात शवों का कर चुके हैं अंतिम संस्कार
इंदौर डेस्क :
शहर या उसके आसपास कोई लावारिस हालत में बीमार पड़ा हो या मानसिक रोगी। परिवार से बेदखल कर सड़क पर छोड़े गए बुजुर्ग हो या लावारिस शव। ऐसे लोगों के लिए इन युवाओं का दिल धड़कता है। वे इन बीमार, मानसिक रोगी, बुजुर्गों की सेवा कर उनके परिवार का पता लगाते हैं और उन्हें सौंपते हैं। परिवार के नहीं मिलने या मना करने पर इन्हें अस्पताल या आश्रम भेज देते हैं। युवाओं का यह समूह लावारिस शवों का कई सालों से अंतिम संस्कार कर रहा है।
मानवीय सेवा करने वाले इस समूह का नाम संस्था सुल्तान-ए-एकता समिति और संस्था महाकाल है। खास बात यह कि संस्था में हर धर्म व आयु के लोग जुड़े हैं। जो समय अनुसार अपना योगदान मानव सेवा में देते हैं। टीम में करीम पठान, जय्यू जोशी, फिरोज पठान, प्रियांशु पाण्डे, सुनील ठाकुर, पंकज कटारिया, पं. श्याम शर्मा, सीमा सेन, अल्तमश सेन, फरहान पठान, कृष्णा सोनी, दिनेश चावला, नारायण अग्रवाल, चर्चित अग्रवाल, टीटू तिवारी, संजय होलकर, अशोक गोयल, साहिल, आनंद आदि हैं। संस्था के सदस्यों की सक्रियता अकसर एमवाय अस्पताल, अरबिंदो अस्पताल, मानसिक चिकित्साय आदि स्थानों पर देखी जा सकती है। ये सभी सड़क पर पड़े बीमार लोगों का इलाज कराते हैं।
टीम का खुद का बड़ा नेटवर्क
संस्था का दायरा सिर्फ इंदौर ही नहीं बल्कि आसपास भी है। टीम के सदस्यों के साथियों ने अपना ऐसा नेटवर्क बनाया है कि भी कभी इंदौर या इंदौर के आसपास कोई हादसे में घायल होता है और उसकी पहचान नहीं होती है तो वहां से संबंधित द्वारा पुलिस के माध्यम से उसे इलाज के लिए एमवाय अस्पताल भेजा जाता है तो यह टीम तुरंत अस्पताल पहुंचकर उसका इलाज करवाती है और उसके परिवार का पता लगाती है। इनके लिए सोशल मीडिया बड़ा माध्यम है। इन युवाओं के नंबर शहर के लगभग सभी थानों, अस्पतालों आदि के पास हैं। यहां से भी इन्हें सूचना देकर सेवा के लिए बुलाया जाता है।
एक साथ पांच शवों का किया अंतिम संस्कार
हाल ही में इन्हें शहर के अलग-अलग पुलिस थाने से कॉल आए कि पांच शव जिनका परिवार और कोई नाते रिश्तेदार नहीं है एमवाय हॉस्पिटल की मर्चुरी में है तो इन युवाओं की टीम तुरंत वहां पहुंची। वहां कागजी कार्रवाई करने के बाद सभी ने रुपए जुटा कर इन शवों का अंतिम संस्कार किया। सदस्यों का कहना है कि कोरोना के बाद पहली बार एक साथ पांच शवों का अंतिम संस्कार किया। इस साल की शुरुआत में संस्था द्वारा 50 लावारिस व्यक्तियों के अस्थियों को पंडितों के माध्यम से विधि विधान के साथ गंगा में विसर्जित किया गया। दस से अधिक भटके हुए मानसिक रोगियों को उनके परिवार से मिलवाया गया तथा सौ से अधिक जरूरतमंद लावारिस व्यक्तियों को अस्पताल में भर्ती किया गया।
सेवा कार्य के लिए गिनती लगाना अनुचित
संस्था सदस्य करीम पठान ने बताया कि यह सेवा कार्य मुझे पिता कलीम पठान द्वारा प्राप्त हुआ है। पिता 1977 से लावारिस शवों को अंतिम संस्कार कर रहे थे और 1997 मैंने यह जिम्मेदारी संभाली। मैं तो मानवीय सेवा करता हूं और सेवा कार्य के लिए गिनती लगाना अनुचित लगता है। यह काम ईश्वर, अल्लाह करवा रहा है, हम तो माध्यम हैं।

परिवार छूटा तो सेवा कार्य में जुट गए
जोबट के रहने वाले जय्यू जोशी के पिता पुलिस सेवा में थे। वे बताते हैं कि मैं जब छोटा था तब माता-पिता का निधन हो गया था। इसके बाद मैं रोजगार की तलाश में इंदौर आया। यहां सड़क पर ऐसे लोगों को लावारिस हालात में देखा जिनका कोई नहीं है। ये लोग अस्पताल, स्टेशन या अन्य जगह वे बीमार हालत में पड़े रहते हैं। ठण्ड में पहनने के लिए कपड़े नहीं रहते। भूख-प्यास से बेहाल रहते हैं तो उन्हें देख मन बहुत विचलित होता था। यहां इंदौर में करीम पठान व फिरोज पठान का साथ मिला तो मैं भी इस काम से जुड़ गया।
टीम को इंदौर या आसपास कहीं भी सूचना मिलती है तो टीम के सदस्य आधे घंटे में वहां पहुंच जाते हैं। वह अगर मानसिक रोगी होता है तो उसे मानसिक चिकित्सालय में भर्ती करवाते हैं। अगर वह शारीरिक रूप से अक्षम या बीमार है तो उन्हें एमवाय अस्पताल, अरबिंदो अस्पताल ले जाकर भर्ती करवाते हैं। उसके परिवार का ढूंढ़ने का पूरा प्रयास किया जाता है और उनके सुपुर्द किया जाता है। परिवार का पता नहीं चलने पर उसकी मृत्यु हो जाती है तो पुलिस की अनुमति के बाद उनका अंतिम संस्कार करते हैं।
फिरोज पठान ने बताया कि जब भी कोई लावारिस जीवित हालत में मिलता है तो टीम के सदस्य खुद की उसकी शेविंग कर उसे नहलाते हैं और नए कपड़े पहनाते हैं। ऐसे में उन्हें और संबंधित दोनों को खुशी की अनुभूति होती है। अगर बीमार है तो उसका इलाज कराते हैं और परिजन का पता नहीं चलता है तो आश्रम के सुपुर्द कर देते हैं। इसके साथ ही समय-समय पर उसके हालचाल जानकर उनकी मदद करते हैं।



