परमानेंट नौकरी सिर्फ चुनावी वादे: मध्यप्रदेश में अनुबंध खत्म होने पर नौकरी से निकाल रहे

भोपाल डेस्क :
प्रदेश के 38 विभागों में नियमित पदों के विरुद्ध संविदा कर्मचारियों को सरकारी कर्मचारियों के समान सेवा शर्तें तय किए जाने और सुविधाएं देने के लिए बनाई गई नीति कागजी साबित हो रही है। संविदा नीति घोषित होने के 6 महीने बाद भी संविदा कर्मचारियों को लाभ नहीं मिल पा रहा है। 2023 जुलाई में लाभ दिया जाना था जो अब तक नहीं दिए गए हैं।
संविदा नीति के अनुसार प्रतिवर्ष अनुबंध प्रक्रिया समाप्त होगी, पर छह महीने में अनुबंध तोड़कर संविदा पर काम कर रहे कर्मचारियों को नौकरी से निकाला जा चुका है। श्योपुर, उज्जैन, आगर और रायसेन में कई मामले सामने आए हैं। इसके अलावा संविदाकर्मियों को एनपीएस के दायरे में नहीं लिया। बीमा, अनुकंपा नियुक्त का लाभ, ग्रेच्युटी का लाभ भी नहीं दिया।
सामान्य प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव विनोद कुमार स्पष्ट कर चुके हैं कि जीएडी ने नीति तैयार कर दी है, इसका विभागों को क्रियान्वयन करना है। रायसेन और सागर समेत अन्य जिलों में 2.25 लाख से कम आय वाले संविदाकर्मियों का टैक्स काटा जा रहा है। वहीं, धार, इंदौर, देवास, बुरहानपुर में प्रोफेशनल टैक्स नहीं काटा जा रहा है। महिला बाल विकास विभाग में 20 से ज्यादा जिलों में प्रोफेशनल टैक्स काटा जा रहा है, जबकि 30 जिलों में नहीं काटा जा रहा है।
कई बैठकों के बाद बने नियम, पर नतीजा शून्य
- 2004-05 में मप्र में संविदा पर भर्ती शुरू हुई, 2008 में चुनाव हुआ, चुनावी वादा नियमित करेंगे। संविदा कर्मचारी नियमित नहीं हुए, नौकरी पर साल के अंत में संकट बरकरार। तब 1.50 लाख संविदा कर्मचारी थे।
- 2013 में चुनाव हुआ, फिर कर्मचारियों को नियमित करने का आश्वासन मिला।
- 25 से ज्यादा बैठकाें के बाद 2018 में नीति आई। जिसमें विसंगतियां बरकरार, मू्ल्यांकन बरकरार रहा। नतीजा सिफर।
- 2023 जुलाई में नीति तैयार हुई, लेकिन लागू नहीं हुई।
- तत्कालीन सीएस इकबाल सिंह बेस ने शासकीय नियमित पदों से समकक्षता निर्धारण करने के लिए 20 विभागों के अफसरों की जुलाई में मैराथन बैठकें ली। मंशा थी कि संविदा कर्मचारियों का वेतन समान किया जाए। समकक्षता का निर्धारण नहीं हो पाया। वेतन भी कम हो गया।



