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कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023 : मुफ़्त की रेवड़ियों पर आपत्ति जताने वाले ही रेवड़ी बाँटने लगे

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कर्नाटक में वादों की बहार आई हुई है। चुनावी मौसम में ये तो होना ही था। आप वाले केजरीवाल जब पिछले साल गुजरात में मुफ़्त की रेवड़ियों की बौछार कर रहे थे तो सबसे पहले भारतीय जनता पार्टी ने यह सवाल उठाया था कि इस तरह चुनाव के वक्त ख़ज़ाना लुटाना आख़िर किस हद तक जायज़ है? मामला कोर्ट में भी गया था, जहां अलग- अलग पक्षों के वकीलों ने खूब दलीलें दीं। कुछ व्याख्या कोर्ट ने भी की लेकिन किसी निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सका। मामला अब भी चल ही रहा है।

कर्नाटक में सोमवार को भाजपा ने अपना चुनाव घोषणापत्र जारी किया है जिसमें मुफ़्त की रेवड़ियों की बहार है। ऐसा नहीं है कि बाक़ी पार्टियाँ यह सब नहीं कर रही हैं। लेकिन चूँकि भाजपा ने मुफ़्त की रेवड़ियों का विरोध किया था इसलिए उसकी ज़िम्मेदारी ज़्यादा बनती है। फिर भाजपा विश्व की सबसे बड़ी पार्टी है, तो बाक़ी सब आपका ही अनुसरण करने वाले हैं, इस मान से भी भाजपा की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है।

कर्नाटक में सबसे पहला वादा है- समान नागरिक संहिता। यह पार्टी का पुराना नारा है और इसमें किसी को कोई आपत्ति होनी भी नहीं चाहिए। हिन्दू मतदाताओं को लुभाने के लिए यह अच्छा प्रयोग हमेशा से रहा है। मुफ़्त की रेवड़ी इसे नहीं कहा जा सकता। मुफ़्त वाले वादे जो भाजपा ने किए हैं, वे हैं- ग़रीबों को रोज़ आधा लीटर मुफ़्त दूध। बीपीएल यानी “बिलो पॉवरटी लाइन” वाले लोगों को हर महीने पाँच किलो राशन की एक मुफ़्त किट।

…और बीपीएल परिवारों को साल में तीन गैस सिलेंडर। इनके भी बाक़ायदा दिन मुक़र्रर किए गए हैं। एक सिलेंडर उगादी यानी दक्षिण भारत के नववर्ष के अवसर पर। दूसरा सिलेंडर गणेश चतुर्थी पर और तीसरा दीपावली के मौक़े पर। उल्लेखनीय है कि कर्नाटक में बीपीएल परिवारों की संख्या 21% यानी 1.29 करोड़ है। यही नहीं, हर वार्ड में अटल आहार केंद्र खोलने का वादा भी किया गया है जहां हर किसी को पंद्रह रुपए में भरपेट भोजन मिला करेगा।

कुल मिलाकर मतदाताओं को लुभाने के सारे इंतज़ाम इस घोषणापत्र में किए गए हैं। ज़ाहिर है बाक़ी पार्टियाँ भी इसी तरह के वादे करेंगी और आख़िरकार कोर्ट में इतनी लम्बी- चौड़ी बहस या विचार- विमर्श के बावजूद यह चुनाव भी मुफ़्त की रेवड़ियों के बूते ही लड़ा जाएगा। चूँकि इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कोई आदेश पारित नहीं किया है।

चूँकि इस बारे में चुनाव आयोग के पास कोई स्पष्ट रेखा नहीं खींची गई है, इसलिए फ़िलहाल सबकुछ जायज़ है। आसमान के तारे तोड़कर कदमों में रख देने का वादा भी कोई पार्टी करे तो इसमें भी फ़िलहाल तो कोई बुराई नहीं ही है। जब तक कि इस मामले में कोई स्पष्ट आचार संहिता या नियम- क़ानून नहीं बन जाते, और कोई उपाय है भी नहीं।

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