इंदौर हाईकोर्ट की तीन तलाक के मामले में इंदौर टिप्पणी: ‘देश समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को समझे, इससे अंधविश्वास और बुरी प्रथा पर लगेगी रोक’

इंदौर डेस्क :
तीन तलाक असंवैधानिक और समाज के लिए बुरा है। कानून निर्माताओं को यह समझने में कई साल लग गए। समय आ गया है कि अब देश समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को समझे। समाज में आज भी आस्था और विश्वास के नाम पर कई कट्टरपंथी, अंधविश्वासी और अति-रूढ़िवादी प्रथाएं प्रचलित हैं। भारत के संविधान में पहले से ही अनुच्छेद 44 शामिल है जो समान नागरिक संहिता की वकालत करता है, लेकिन समय आ गया है कि अब इसे सिर्फ कागज पर नहीं बल्कि वास्तविकता बनाया जाए। एक अच्छी तरह से तैयार समान नागरिक संहिता ऐसे अंध विश्वासों और बुरी प्रथाओं पर रोक लगाने का काम करेगी। इससे राष्ट्र की अखंडता को मजबूती भी मिलेगी।
ये टिप्पणी मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंड पीठ ने तीन तलाक से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए की है।
पहले जानिए क्या है मामला
दरअसल, बड़वानी जिले के राजपुर निवासी मुस्लिम महिला ने मुंबई निवासी पति, सास और ननद के खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज करवाई थी। महिला के पति ने उसे तीन तलाक दिया था। महिला ने तीनों आरोपियों के खिलाफ तीन तलाक और दहेज प्रताड़ना की धाराओं में प्रकरण दर्ज करवाया था। जिसे निरस्त करने के लिए इंदौर हाईकोर्ट में याचिका लगाई गई थी। कहा गया था कि तीन तलाक की धारा सिर्फ पति के खिलाफ लगाई जा सकती है सास और ननद के खिलाफ नहीं। वे इसके लिए उत्तरदायी नहीं हैं।
शासन की ओर से पैरवी कर रहे एडवोकेट अमेय बजाज ने बताया कि कोर्ट ने तर्कों पर विचार करने के बाद सास और ननद के खिलाफ तीन तलाक की धारा में दर्ज अपराध को निरस्त कर दिया है। उनके खिलाफ सिर्फ दहेज प्रताड़ना की धारा में केस चलेगा।
कोर्ट की ये है पूरी टिप्पणी
तलाक, मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है। जो विवाह विच्छेद को दर्शाता है, जब एक मुस्लिम व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ वैवाहिक संबंध तोड़ देता है। मुस्लिम कानून के तहत सिर्फ तीन तलाक यानी तुरंत ही शादी के रिश्ते से मुक्ति अपरिवर्तनीय, जहां आदमी, केवल तीन बार ‘तलाक’ शब्द बोल कर, अपनी शादी खत्म करने में सक्षम है। इस प्रकार का तात्कालिक तलाक कहलाता है।
तीन तलाक, जिसे ‘तलाक-ए-बिद्दत’ भी कहा जाता है।” यह स्पष्ट है कि में तलाक-ए-बिद्दत या तीन तलाक, में शादी कुछ ही सेकंड के अंदर टूट सकती है। पति अगर गलती भी सुधारे तो महिला को ही हलाला के अत्याचारों का सामना करना पड़ता है। शायरा बानो बनाम के प्रसिद्ध मामले में भारत संघ और अन्य (AIR 2017 SC 4609) तीन तलाक की प्रथा पहले से ही है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ द्वारा अवैध घोषित किया गया। तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाया गया है। ताकि मुस्लिम समुदाय की महिलाओं को वैवाहिक न्याय और सुरक्षा मिले। तीन तलाक को कानून के रूप में भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया। कहा गया कि ये आपराधिक कृत्य है। यह निश्चित रूप से समानता की दिशा में एक बड़ा कदम है। कानून निर्माताओं को यह समझने में कई साल लग गए कि तीन तलाक असंवैधानिक और समाज के लिए बुरा है।
हमें अब चाहिए कि देश में “समान नागरिक संहिता” की आवश्यकता को समझें। और भी बहुत सारे निंदनीय, कट्टरपंथी, अंधविश्वासी हैं और समाज में प्रचलित अति-रूढ़िवादी प्रथाएं हैं। भारत का संविधान अनुच्छेद 44 पहले से ही समाहित है, जो समान नागरिक संहिता की वकालत करता है। नागरिकों के लिए इसे केवल कागजों पर नहीं बल्कि वास्तविकता बनने की जरूरत है। अच्छी तरह से तैयार समान नागरिक संहिता अंधविश्वास और कुप्रथाओं पर अंकुश लगाने का काम कर सकती है। ये राष्ट्र की अखंडता को सुदृढ़ करेगा।
एक छोटी बेटी है
2021 में दोनों की शादी हुई। एक छोटी बेटी है। पति का मुंबई में ही मोबाइल का बिजनेस है। शादी के कुछ समय बाद ही महिला ने बड़वानी आकर पति, सास और ननद के खिलाफ केस दहेज प्रताड़ना और तीन तलाक का केस दर्ज करवा दिया था। तभी हाईकोर्ट में सास और ननद की तरफ से याचिका लगाई गई थी। लंबे समय तक याचिका पेंडिंग रही। मामले में अब कोर्ट का फैसला आया है। तीन तलाक वाले केस से दोनों को मुक्त कर दिया है।
10 पेज का फैसला
पति को कोर्ट ने कोई राहत नहीं दी है। न्यायमूर्ति अनिल वर्मा ने 10 पेज के फैसले में तीन तलाक को गंभीर मुद्दा बताते हुए कहा कि तीन तलाक में शादी को कुछ ही सेकेंड में तोड़ा जा सकता है और समय वापस नहीं लाया जा सकता। दुर्भाग्य से यह अधिकार केवल पति के पास है और अगर पति अपनी गलती सुधारना भी चाहे तो निकाह हलाला के अत्याचारों को महिला को ही झेलना पड़ता है। कोर्ट ने समान नागरिक संहिता की आवश्यकता बताते हुए कहा कि आस्था और विश्वास के नाम पर प्रचलित कट्टरपंथी प्रथाओं पर अंकुश लगाने के लिए ‘समान नागरिक संहिता’ की आवश्यकता है।



