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सांची में दो महाबोधि महोत्सव का शुभारंभ: रविवार को पूजा-अर्चना के बाद बौद्ध भिक्षुओं द्वारा अस्थि कलश को सिर पर रखकर सांची के मुख्य स्तूप की परिक्रमा की जाएगी

न्यूज़ डेस्क :                                       सीताराम वाघेला

रायसेन के सांची में शनिवार को 71वें महाबोधि महोत्सव की शुरुआत हुई। दो दिनी इस आयोजन में भगवान गौतम बुद्ध के दो मुख्य शिष्यों के अस्थि कलशों को दर्शन के लिए रखा गया है। महोत्सव में श्रीलंका, वियतनाम, थाईलैंड, जापान सहित अन्य देशों से आए बौद्ध अनुयायी शामिल हैं। श्रीलंकन महाबोधि सोसायटी के चीफ वानगल उपतीस नायक थेरो तीन साल बाद उत्सव में शामिल होने सांची पहुंचे हैं।

महाबोधि सोसायटी के तपस्वी स्वामी ने बताया कि सांची स्थित बौद्ध स्तूप के गर्भगृह में एक तहखाना है। इसमें भगवान बुद्ध के इन दोनों शिष्यों की अस्थियां रखी जाती हैं। तहखाने की एक चाबी कलेक्टर तो दूसरी महाबोधि सोसायटी के पास रहती है। महोत्सव के दौरान दोनों चाबियों को मिलाकर ही ताला खोला जाता है और अस्थि कलश बाहर लाए जाते हैं।

उन्होंने बताया कि अरहत सारिपुत्र और अरहत महामोग्गलान के पवित्र अस्थि अवशेष को चेतियगिरि विहार के गर्भगृह से शनिवार सुबह बाहर लाया गया। सुबह 7 बजे महाबोधि सोसायटी के कार्यालय से विहार तक अस्थि कलश यात्रा निकाली गई। सुबह 8 बजे अस्थि कलशों की विशेष पूजा की गई। इसके बाद 9 बजे इनको श्रद्धालुओं के दर्शनों के लिए रखा गया।

शाम 5 बजे पूजन कार्यक्रम के बाद चेतियगिरि विहार के कपाट बंद होंगे। कल रविवार को पूजा-अर्चना के बाद बौद्ध भिक्षुओं द्वारा अस्थि कलश को सिर पर रखकर सांची के मुख स्तूप की परिक्रमा की जाएगी। इस आयोजन में करीब 1 लाख लोग शामिल होंगे।

स्तूप की खोज से लेकर वर्तमान रूप देने तक इसकी यात्रा में कई पड़ाव आए। खजाने को ढूंढने के लिए इसका विध्वंस भी किया गया, बाद में पुनर्निर्माण भी हुआ। newsupdate आपको बता रहा है सांची स्तूप के बनने से लेकर अब तक की पूरी कहानी…

सम्राट अशोक ने कराया था सांची में स्तूप का निर्माण

बेतवा नदी किनारे बने सांची स्तूप रायसेन जिले में स्थित हैं। ये भोपाल से 46 तो विदिशा से 10 KM दूर हैं। तीसरी शताब्दी ईसा में मौर्य सम्राट अशोक ने सांची का मुख्य स्तूप बनवाया था। आज यहां छोटे-बड़े कई स्तूप हैं, जिनमें से स्तूप नंबर-2 सबसे बड़ा है। यह चारों ओर हरियाली और कई तोरण द्वारों से घिरा है। स्तूप नंबर-1 के पास छोटे-छोटे अन्य कई स्तूप बने हैं।

पुरातत्वविद राजीव लोचन चौबे के अनुसार, कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया था। उन्होंने शांति का प्रचार-प्रसार करने के लिए सांची में स्तूप का निर्माण करवाया। निर्माण कार्य सम्राट ने पत्नी महादेवी सक्यकुमारी को सौंपा था। पूरे स्तूप का निर्माण ईंटों से हुआ। महादेवी विदिशा के एक व्यापारी की बेटी थीं। सम्राट अशोक और महादेवी की शादी भी सांची में हुई थी।

शुंग राजा ने बिगाड़ा तो उनकी पीढ़ियों ने ही संवारा

इतिहासकारों के मुताबिक, ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में शुंग वंश के सम्राट पुष्यमित्र शुंग ने स्तूप का विध्वंस किया था। इसके बाद पुष्यमित्र के बेटे अग्निमित्र ने पत्थरों से स्तूप को दोबारा बनवाया। शुंग काल के अंत तक स्तूप का दोगुना विस्तार हो चुका था। इस दौरान इसके गुंबद को चपटा कर एक हिस्से के ऊपर छतरियां बनवा दी गई थीं।

स्तूप के शिखर पर धर्म प्रतीक और विधि चक्र लगा था। सातवाहन काल में तोरण द्वारों और कटघरों का निर्माण कराया गया था, जिन्हें सुंदर रंगों से रंगा गया था। कहा जाता है कि द्वारों के आकार और उन पर बनाई गई कलाकृतियां सातवाहन राजा सातकर्णी ने ही तैयार कराई थीं।

खजाने के लालच में किया था स्तूप का विध्वंस

14वीं शताब्दी तक स्तूप दयनीय स्थिति में पहुंच गया था। उस दौर के किसी भी शासक ने स्तूप के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया। सन् 1615 तक भारत की भूमि पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने पैर पसारने शुरू कर दिए थे। समय बीतता गया, वर्षों पुराना इतिहास समेटे सांची स्तूप की स्थिति भी दयनीय होती गई। खजाने के लालच में लोगों ने स्तूप के पास खूब खुदाई की।

साल 1818 में एक ब्रिटिश अधिकारी जनरल टेलर ने सांची के स्तूप की खोज की। इन्होंने स्तूप के बारे में जानकारी इकट्‌ठा की। स्तूप की निर्जन हो चुकी अवस्था को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन मार्शल को इसके पुनर्निर्माण का कार्य सौंपा। सर मार्शल ने साल 1912 में स्तूप का पुनर्निर्माण शुरू कराया।

1919 तक स्तूप को दोबारा खड़ा कर लिया गया। ये वही निर्माण है, जो आज हमें सांची में दिखता है। वर्ष 1919 में सर मार्शल ने स्तूप के संरक्षण के लिए एक पुरातात्विक संग्रहालय की स्थापना की। जिसे बाद में सांची पुरातत्व संग्रहालय के रूप में बदल दिया गया।

मुख्य स्तूप के 4 तोरण द्वार, बुद्ध कथाओं को उकेरा

सांची में 2 स्तूप खास हैं। इनमें से मुख्य स्तूप के चारों दिशाओं में चार तोरण द्वार हैं। इन तोरण द्वारों पर भगवान बुद्ध से संबंधित कथाओं को उकेरा गया है। सांची का स्तूप भारत के सबसे बड़े स्तूपों में से एक है, जिसकी ऊंचाई करीब 21.64 मीटर और व्यास 36.5 मीटर है।

स्तूप में 4 तोरण द्वार हैं, जिन पर तथागत गौतम बुद्ध के जीवन से लेकर परिनिर्वाण तक की कथाएं चित्रित हैं। स्तूप का निर्माण कुछ इस प्रकार से किया गया है कि बौद्ध धर्म की शिक्षा और उसका अध्ययन करने वाले लोगों को आसानी हो।

इंग्लैंड से अस्थियां सांची लाए, तब से मनाते हैं महोत्सव

महाबोधि सोसायटी के तपस्वी स्वामी ने बताया कि वर्ष 1818 में ब्रिटिश अफसर ने सांची की खोज की थी। साल 1851 में जनरल कनिंघम और कैप्टन मेसी सांची और सतधारा स्तूपों से सारीपुत्र और महामोदग्लायन की अस्थियों को निकालकर ब्रिटेन ले गए। कैप्टन और जनरल ने शिष्यों के अस्थि कलश को इंग्लैंड के विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम में रख दिया था।

साल 1936 में श्रीलंका की महाबोधि सोसायटी ने इन अस्थियों को भारत लाने का प्रयास किया। भोपाल के तत्कालीन नवाब और महाबोधि के प्रयासों से अस्थियों को सांची लाया गया। चेतियगिरि विहार का निर्माण कराया। 30 नवंबर 1952 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दोनों शिष्यों की पवित्र अस्थियों को सांची में स्थापित करवाया। तब से ही हर साल नवंबर में बौद्ध सांची महोत्सव मनाया जा रहा है।

नवंबर के आखिरी शनिवार और रविवार को आयोजन

भगवान बुद्ध के परम शिष्य सारिपुत्र और महामोदग्लायन की अस्थियों के दर्शन के लिए हर साल नवंबर के आखिरी शनिवार और रविवार को बौद्ध महोत्सव मनाया जाता है। महोत्सव के अस्थि कलशों को चेतियगिरि विहार के तलघर से निकालकर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए रखा जाता है।

इन 2 दिनों में अस्थि कलशों की यात्रा निकाली जाती है, जिसमें मुख्य स्तूप की परिक्रमा लगाई जाती है। बता दें कि महोत्सव का आयोजन महाबोधि सोसायटी और प्रशासन द्वारा किया जाता है।

विहार के गर्भ गृह के ताले न तो अकेला प्रशासन खोल सकता है और न ही महाबोधि सोसायटी। ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों के पास एक-एक चाबी होती है। यहां लगे तालों को खोले जाने के लिए दोनों चाबियों की जरूरत होती है। दोनों पक्षों के जिम्मेदार पदाधिकारियों की मौजूदगी में ही गर्भगृह के ताले खोलकर पवित्र अस्थि कलश निकाले और वापस रखे जाते हैं। ऐसा इसलिए जिससे कलश की सुरक्षा में कोई सेंध नहीं लगा सके।

थेरो बोले- शांति का संदेश यहीं से श्रीलंका पहुंचा

लंकाजी टेंपल जापान के मुख्य संघनायक एवं श्रीलंकन महाबोधि सोसायटी के चीफ वानगल उपतीस नायक थेरो ने बताया कि श्रीलंका के लिए सांची सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है। इस स्थान से ही भगवान बुद्ध का संदेश उनके परम शिष्य सारिपुत्र और महामोदग्लायन श्रीलंका गए थे।

सांची का बौद्ध मेला 1952 से लगातार आयोजित किया जा रहा है। इस बार 71वां महोत्सव मनाया जा रहा है। थेरो ने कहा- दिल्ली से मुंबई और चेन्नई तक की ट्रेनें सांची से होकर गुजरती हैं, लेकिन उनके स्टॉपेज यहां नहीं हैं। उन्हें सांची रेलवे स्टेशन पर हॉल्ट देना चाहिए, ताकि सांची के स्तूपों को देखने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोग आ सकें।

दो दिनी महोत्सव में होने वाले कार्यक्रम

25 नवंबर
बुद्ध वंदना – भरतनाट्यम की प्रस्तुति (कलांजली ग्रुप, भोपाल)

‘बुद्धभाव’ नृत्य नाटिका (सुश्री अर्पणा चतुर्वेदी एवं साथी, भोपाल)

अनहद – बांसुरी वादन (डॉ. हरिप्रसाद पौड्याल एवं साथी, भोपाल)

26 नवंबर

सूफी गायन (श्री सलीम अल्लाहवाले एवं साथी, भोपाल)

‘न्याय दया का दानी ‘ नृत्य नाटिका (सुश्री हर्षिता दाधीच एवं साथी, इंदौर)

पखावज वृंद – पखावज वादन (श्री अखिलेश गुन्देचा एवं साथी, भोपाल)

कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने कराया निर्माण

चक्रवर्ती सम्राट अशोक का जन्म मौर्य राजवंश में हुआ था। उन्होंने 269 ईसा पूर्व से 232 ईसा पूर्व तक असम से लेकर ईरान तक राज किया। अशोक का राज्य उत्तर में हिंदु कुश, तक्षशिला की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी, सुवर्णगिरी पहाड़ी और मैसूर तक था। पूर्व में असम तो पश्चिम में अफगानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान तक सम्राट अशोक ने राज किया।

अशोक के जीवन में कलिंग का युद्ध सबसे महत्वपूर्ण रहा। इसमें 1 लाख लोगों की मौत और 1.5 लोगों के घायल होने के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था।

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