विदिशा

स्वामी मैथिलीशरण जी महाराज ने कहा कि जब तक हम कच्ची मिट्टी बने रहेंगे तब तक हमारे जीवन में निर्माण की अनंत संभावनाऐं बनी रहेंगी

आनंदपुर डेस्क :

।।श्रीरामचरितमानस की सनातनता।।

।।श्रीरामचरितमानस ज्ञान यज्ञ-दूसरा दिन।।

जिसको जाने बग़ैर झूठ भी सत्य लगता है,जिसको जिसको जान लेने पश्चात संसार बैसे ही खो जाता है जिसे स्वप्न टूटने पर स्वप्न में दिखाई दिये हुए सारे दृश्य स्वत:ही मिथ्या सिद्ध हो जाते हैं। भगवान शंकर पार्वती जी को रामकथा सुनाते हुए कहते हैं कि ऐसे मेरे एकमात्र प्रभु श्रीराम हैं।मैं उनके बाल रूप की आराधना करता हूँ । वे ही सत् हैं वे ही चित् और वे ही आनंद हैं।उन्होंने कहा पार्वती तुम धन्य हो जिसने संसार का हित करने बाली कथा सुनने की जिज्ञासा की । पार्वती रामकथा गंगा की भगीरथ हैं जो अपने मोह, अज्ञान के हरण के लिए कथा की जिज्ञासा करती हैं, वह कथा सारे संसार के अज्ञान हरण करने बाली सिद्ध हुई।

स्वामी मैथिलीशरण,,,,

श्रीरामदास हनुमान जी ( आनंदपुर लटेरी) के पवित्र प्रांगण में चल रही राम कथा के दूसरे दिन कथा के प्रारम्भ में ये विचार श्रीरामकिंकर विचार मिशन के अध्यक्ष स्वामी मैथिलीशरण ने प्रस्तुत किए।

स्वामी जी ने कहा कि जब तक हम कच्ची मिट्टी बने रहेंगे तब तक हमारे जीवन में निर्माण की अनंत संभावनाऐं बनी रहेंगी । बर्तन या मूर्ति बनते ही उसके टूटने की संभावना ही शेष रह जाती है।क्योंकि वर्तन का नाम रूप और उपाधि हो जाती है। खंडित उपाधि होती है मिट्टी सर्वदा बनी ही रहती है।अयोध्या में महारानी कैकेई ने राज्य को और पुत्र भरत को जिस दृष्टि से देखा उस दृष्टि से भगवान राम ने न तो राज्य को देखा न ही भरत को देखा।

कैकेई जी का दर्शन अहमता और ममता पर आधारित था, क्यों कि राज्य के प्रति उनकी अहमता है और भरत अपने पुत्र के प्रति ममता है। यही ममता और अहमता व्यक्ति और समाज को चबाये जा रही है।

सपने होई भिखारि नृप रंक नाकपति होई।

जागे हानि न लाभ कछु तिमि प्रपंच जिए जोई।।

सपने में भिखारी राजा बन जाए। राजा भिखारी बन जाए तो क्या जागने के बाद भी वे भिखारी या राजा रहेंगे?

यही स्थिति माया और मोह ग्रस्त कैकेई की हो गई।अंत

और श्रीराम का दर्शन साक्षी और प्रेमी भाव था। वेद में जिसको साक्षी कहते हैं भक्ति में उसी को प्रेम कहते हैं। हम वृक्ष , प्रकृति, सूर्य पृथ्वी चन्द्रमा, सम्पत्ति को जिस दृष्टि से देखते हैं वह असंग और साक्षी-आत्मा दृष्टि नहीं है। पर सूर्य पृथ्वी चन्द्रमा, वृक्ष जिस तरह हमें देखते हैं वह साक्षी दृष्टि है।सूर्य किसी भी जगह अपूर्ण नहीं है, आकाश कहीं खंडित नहीं है। सनातन प्रथ्वी, जल बायु अग्नि और आकाश की तरह सत्य और सबके कल्याण को लिए है, इसीलिए श्रीरामचरितमानस त्रिकाल सत्य श्रीराम का प्रतिपादन करता है और वे आराध्य हैं।राम परब्रह्म परमात्मा हैं।

भगवान राम को तो राज्य मिलने की बात सुनकर कोई आनंद-हर्ष हुआ ही नहीं कि मैं राजा बन जाऊँगा । वे तो शयन कक्ष में जाकर यही चिंतन करते हैं कि सूर्य वंश में सारी परम्पराऐं श्रेष्ठ हैं पर यह परम्परा जिसमें छोटे भाई को छोड़कर बडे को राज्य दिया जाता है यह अनुचित है। हम भाइयों का जन्म साथ हुआ, साथ किया, शयन साख किया शिक्षा यगोपवीत साथ में हुआ तो बड़े हो जाने पर छोटे का अधिकार छीन कर बड़े को राज्य दे दिया जाता है। राम में न तो स्वयं कोई भेद है और न भरत में राम को लेकर कोई भेद है, भेद तो अहमता और ममता में होता है।

श्रीरामकी व्यापकतावऔर करुणा की दिव्य चर्चाओं की विशद व्याख्या सुनकर श्रोताओं में सुख और आनंद का संचार हुआ।

श्रीरामचरितमानस की सनातनता को सिद्ध करते हुए स्वामी जी ने कहा कि सनातन त्रिकाल सत्य है, यह अनादि और अनंत है। सनातन किसी प्रमाण और तुलना का मोहताज नहीं है।रामायण की सनातनता और व्यापकता यह है कि वह सबका प्रिय है और सबका हितकारी है, दुख सुख और प्रशंसा और गाली में भी अपने समत्त्व से बिचलित नहीं होता है।

News Update 24x7

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!