मध्यप्रदेश

संत सियाराम बाबा का निधन: कड़ाके की ठंड में सिर्फ एक लंगोट

न्यूज़ डेस्क :

निमाड़ के संत सियाराम बाबा का बुधवार सुबह मोक्षदा एकादशी पर सुबह 6 बजकर 10 मिनट पर निधन हो गया। नर्मदा के भट्यान तट पर आज शाम 4 बजे उन्हें अंतिम विदाई दी जाएगी।

वे पिछले कई दिनों से बीमार चल रहे थे।

संत सियाराम बाबा का आश्रम मध्यप्रदेश में खरगोन जिला मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर दूर भट्यान गांव में नर्मदा किनारे स्थित है। गांव के लोग बाबा से जुड़ी कई चमत्कारिक घटनाएं बताते हैं। बाबा के दर्शनों के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु नर्मदा किनारे स्थित इस गांव में आते हैं। उनके नाम से ही गांव प्रसिद्ध हो चुका है। देश-विदेश से लोग इनके दर्शनों के लिए आते हैं।

इंदौर के महापौर पुष्‍यमित्र भार्गव ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा, प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त तथा निमाड़ के सुप्रसिद्ध संत श्री सियाराम बाबा जी के प्रभुमिलन का समाचार अत्यंत दुःखद है। परमपिता परमात्मा दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में विशेष स्थान प्रदान करें तथा उनके समस्त भक्तों को दुःख की इस घड़ी में सम्बल प्रदान करें।

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भाजपा नेता हितानंद ने भी एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा कि परमहंस सद्गुरसंत, हनुमान भक्त सियाराम बाबा का आज मोक्षदा एकादशी पर देवलोकगमन हो गया। श्रद्धेय बाबा जी ने जीवन पर्यंत रामायण का पाठ करते हुए समाज को धर्म, भक्ति और सदाचार का संदेश दिया, उनका सम्पूर्ण जीवन मानवता, धर्म और नर्मदा मैया की सेवा में समर्पित रहा, बाबा जी का निधन देश व धर्म के लिए अपूरणीय क्षति हैं। ईश्वर पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें एवं उनके अनुयायियों को इस दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।

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कड़ाके की ठंड में सिर्फ एक लंगोट : संत बाबा के तन पर कपड़े के नाम पर केवल एक लंगोट होती थी। कड़ाके की ठंड हो, बरसात हो या फिर भीषण गर्मी, बाबा लंगोट के अतिरिक्त कुछ धारण नहीं करते। ग्रामीण बताते हैं कि आज तक उन्होंने बाबा को कभी पूर्ण वस्त्रों में नहीं देखा। श्रद्धालु बताते हैं कि बाबा 10 सालों तक खड़े होकर तप किया था।

 

हनुमानजी के भक्त : बाबा के बारे में किसी को अधिक जानकारी नहीं है। ग्रामीणों के मुताबिक बाबा हनुमानजी के भक्त हैं। नर्मदा किनारे ही हनुमानजी का एक छोटा-सा मंदिर है, लेकिन किसी विवाद के चलते मंदिर को दीवार से पूरा ढंक दिया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर पर दीवार होने के बाद कान लगाने पर भी घंटी की आवाज आती है। ग्रामीण बताते हैं कि बाबा वर्षों पूर्व महाराष्ट्र से नर्मदा किनारे आए थे।

 

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