देवउठनी ग्यारस आज: रात्रि में शंख बजाकर मंत्र से भगवान को जगाएं

विदिशा डेस्क :
बेर, भाजी, आंवला, उठो देव सांवला, उठो देव, बैठो देव, पांवड़ी चटकाओ देव जैसे तमाम भजन, लोकगीत और श्लोक पढ़कर श्रद्धालु क्षीरसागर में योगनिद्रा में रहने वाले भगवान विष्णु को उठाएंगे। चातुर्मास के 4 महीने तक योग निद्रा में रहने के बाद भगवान विष्णु अपनी निद्रा का त्याग करते हैं। इस तिथि को देव प्रबोधनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन पूजन का विशेष फल प्राप्त होता है।
पर्व से एक दिन पहले से ही इसकी तैयारी शुरू हो गई थी। मंदिरों को को भी एक दिन पहले से सजाया गया था। मंदिरों में पूजा-पाठ के अलावा सामूहिक तौर पर तुलसी-सालिगराम विवाह के आयोजन होंगे। भगवान के विवाह के पश्चात 24 नवंबर से लग्नसरा का सीजन प्रारंभ हो जाएगा। एक दिन पहले बाजार में पूजन सामग्री की जमकर बिक्री हुई। लोगों ने 100 रुपए में 4 गन्ने खरीदे।
शंखासुर नामक राक्षस का किया था वध:
पंडित विनोद शास्त्री बताया कि हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस दिन से विवाह, गृह प्रवेश तथा अन्य सभी प्रकार के मांगलिक कार्य आरंभ हो जाते हैं।
माना जाता है कि भगवान श्री विष्णु ने भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी को महापराक्रमी शंखासुर नामक राक्षस को लम्बे युद्ध के बाद समाप्त किया था और थकावट दूर करने के लिए क्षीरसागर में जाकर सो गए थे और चार मास पश्चात फिर जब वे उठे तो वह दिन देव उठनी एकादशी कहलाया।
इस पूजा विधि से करें भगवान की आराधना
इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर पूजा स्थल को साफ करें और आंगन में चौक बनाकर भगवान श्रीविष्णु के चरणों को कलात्मक रूप से अंकित करें। रात्रि के समय घंटा और शंख बजाकर मंत्र से भगवान को जगाएं। गन्ने का मंडप बनाकर एक चौकी पर भगवान विष्णु, लक्ष्मी, तुलसी को विराजमान कर विधिवत भगवान का पूजन करना और परिक्रमा करना चाहिए।
इसके बाद भगवान को जल, दूध, पंचामृत शहद, दही, घी, शकर, हल्दी मिश्रित जल, तथा अष्ट गंध से स्नान कराएं। इसके बाद नये वस्त्र अर्पित करें फिर पीले चंदन का तिलक लगाएं श्रीफल अर्पित करें, नैवेद्य के रूप में विष्णु जी को ईख, अनार, केला, सिंघाड़ा बेर, सीताफल, चने की भाजी आदि अर्पित करने चाहिए। फिर कथा का श्रवण करने के बाद आरती करें और बंधु बांधवों के बीच प्रसाद वितरित करें।



