रामकथा सातवां दिन: गुरु के बिना विद्या पाचक नहीं होती गुरु ऐसी विद्या देते हैं जो पाचक होती है। मोरारी बापू
आनंदपुर डेस्क :
शास्त्रों में राम तारक ब्रह्म है मारक ब्रह्म नहीं है। आश्रित के सुकृत के लिए सद्गुरु पैदल निकालता है वह एक स्वधर्म है। बुद्ध पुरुष हमारा कर्म खा जाते हैं।
आनंदपुर से प्रवाहित रामकथा के सातवें दिन भगवान की बाल लीला और भुसुंडि कैलाश से बाल लीला देखने आते हैं।।विद्यविध संस्कार, नामकरण संस्कार हुए।वशिष्ठ ने आनंदसिंधु,सुखराशि से भरे पुत्र का नाम राम रखा। यद्यपि राम नाम आदि अनादि है। लेकिन प्रभु निर्गुण से सगुण हुए तो नाम राम रखा गया।। राम समान ही वर्ण वाले कैकय पुत्र का नाम भरत और मन से कटुता शत्रुता मिट जाए मिट जाए वेरी नहीं वैर मिट जाए ऐसे पुत्र का नाम शत्रुघ्न रखा गया और राम के अत्यंत प्रिय समस्त लक्षणों के धाम, जगत आधार शेषावतार पुत्र का नाम लक्ष्मण रखा गया। राजन! यह केवल पुत्र नहीं वेदों के सूत्र है।चारों वेद के प्राण रूप महावाक्य है।।गुरु के बिना विद्या पाचक नहीं होती गुरु ऐसी विद्या देते हैं जो पाचक होती है। अल्पकाल में सब विद्या चारों भाइयों ने पाई।। बाललीला के बाद विश्वामित्र का प्रसंग।राम रूपी सतगुरु राम रूपी परमात्मा कीस तरह अपना स्वधर्म बजाता है? एक के बाद एक प्रसंग में स्वधर्म का समाधान करते चलेंगे।।निर्गुण से परमात्मा सगुण होते हैं लोकमंगल और लोकसंग्रह के रूप में कार्यरत होते हैं तो अपना स्वधर्म कैसे निभाता है वह देखेंगे।।

विश्वामित्र महा मुनि ज्ञानी।
बसही विपिन सुभ आश्रम जानी।।
बक्सर में शुभ आश्रम में रहते थे वहां जप यज्ञ और योग करते थे। मारीच सुबाहु अनुष्ठान में बाधा करते थे। विश्वामित्र सोचते हैं मैं शाप देकर मार सकता हूं तार नहीं सकता।। शास्त्रों में राम तारक ब्रह्म है मारक ब्रह्म नहीं है।।जो मारे और तारे ऐसा कौन होगा?ध्यान में देखा ऐसा तत्व अयोध्या में प्रगट हो चुका है। सरजू तट पर गए स्नान करके दशरथ के दरबार में आए।। पूजन स्वागत हुआ महामुनी और ज्ञानी है।। ज्ञानी भी कभी-कभी अपने को अनाथ महसूस करते हैं।। यह प्रकरण का संकेत व्यक्ति सतकर्म करती है तब परमात्मा का सत्कर्म के प्रति क्या स्वधर्मा है वही है।। और विश्वामित्र के साथ चले अवतार कार्य का श्रीगणेश किया।रास्ते में एक ही बाण से प्राण हर लिया और दीन जानकर मुनि दुर्लभ पद ताडका को दिया।। परमात्मा के पास जो पिन सामर्थ्यवान होकर जाते हैं उसे प्रतिष्ठा देते हैं दीन बनकर जाता है उसे निज पद देता है।।बाद में जनकपुर में धनुष यज्ञ की बात कि रास्ते में गौतम ऋषि का आश्रम,अहल्या का प्रकरण।अहिल्या उद्धार के बाद जनकपुर में सुंदर सदन और पुष्प वाटिका का प्रसंग, परशुराम का आगमन और गमन का प्रकरण और माकशर शुक्ल पंचमी गोरज बेला पर चारों भाइयों का विवाह प्रसंग।।यह बालकांड के संक्षिप्त धारा है।।हर प्रसंग में सद्गुरु का स्वधर्म का दर्शन होता है।।

हमारे यहां कर्म के प्रकार में एक है सुकर्म- अच्छा कर्म।जप,यज्ञ,दान,तप क्रोध न करना नाथ की खोज सुकर्म है।।वह बुद्ध पुरुष सद्गुरु बाधा मिटाने के लिए अपना तमाम ऐश्वर्या मिटा कर पैदल निकल जाता है।।आश्रित के सुकृत के लिए सद्गुरु पैदल निकालता है वह एक स्वधर्म है।।विश्वामित्र के पास शस्त्र शास्त्र साधन मंत्र साधना और सूत्र सब कुछ था फिर भी यज्ञ पूरा नहीं हुआ क्योंकि रामरूपी सत्य और लक्ष्मण रुपी त्याग के बिना यज्ञ पूरा नहीं होता।।सुकर्म पर सद्गुरु प्रसन्न होता है ये प्रसंग में दिखता है।।अच्छे से अच्छे आदमी को भी अच्छे से अच्छे महापुरुष पर शंका पैदा होती है जिनके प्रति पूर्ण निष्ठा है उन पर कभी शंका होती है। किसी आस्था के स्थान पर कभी न कभी आपको संशय हुआ होगा।। स्वभाव में ही पड़ा है तो कभी न कभी निकलेगा।निंदा तो अपने मां बाप की भी करते हैं, इर्षा सगे भाई की भी करते हैं और हम द्वैष भले करने वाले का भी करते हैं।। विकर्म पर काम करना सद्गुरु का स्वधर्म है।।बुद्ध पुरुष हमारा कर्म खा जाते हैं। जनक के पास जनक प्रसंग में कर्म है।। जनक ज्ञानी है।।हमें कर्म फल भोगना ना पड़े तो हमारा कर्म खा जाता है।। हमारा स्वभाव खा जाता है हमारा काल रखा जाता है।।चौथा है कुकर्म,दुरित कर्म, षड्यंत्र करके बनाया गया कपट,विकर्म धोया जाता है, कर्म खाया जाता है कुकर्म तो धोया या खाया भी नहीं जाता।। सद्गुरु हमारे कुकर्म भूल जाता है।बहुत भुलक्कड़ है! हरीश भाई ने कविता भेजी थी अभाव के ऐश्वर्य की यह बात है।। और फिर सभी प्रसंग और धनुष यज्ञ के प्रसंग का संवादी और रसीक गान हुआ।।
बापू ने कहा कि अभी चैत्र नवरात्र अगली २२ तारीख से शुरू हो रहे हैं।। जितना हो सके रामचरितमानस का पाठ जरूर करना।। और गिरीजा की यह स्तुति:
जय जय गिरिवर राज किशोरी।
जय महेश मुख चंद्र चकोरी।।
जय गज बदन षडानन माता…



