विदिशा

रामकथा के तीसरे दिन बापू बोले – मिट्टी कुछ नहि बोलती… मुझे और आपको बुद्ध पुरुष के पास मिट्टी बनना पड़ता है।

आनंदपुर डेस्क :
सिध्ध और शुद्ध संकल्प से शुरू हुई रामकथा के तीसरे दिन इस मंत्र से आरंभ करते हुए बापू ने कहा कि त्रिभुवन दादा रामकथा सिखाते थे। बीच में महाभारत भी करते थे और संदर्भ रखते थे। मानस बिल्कुल खुला है।इसे खुले द्वार में प्रवेश करने के लिए सद्गुरु हमें संकेत करते हैं।। कभी गीता,कभी महाभारत की उंगली देकर हमें प्रवेश करवाते थे।। किसी एक बार की स्मृति है ३० साल पहले दिल्ली में कथा थी।१९९३ में, जगतगुरु शंकराचार्य का प्रागट्य दिन था।परिव्राजक विद्या वारिधि विद्यायानंद गिरी जी का संकल्प था कि दिल्ली में शंकराचार्य जी का एक स्मारक होना चाहिए।। मोदीनगर में कथा हुई।। बाद में दूसरी कथा हुई एक कथा और आयोजित हुई वह १० दिन की कथा थी।। सुंदर स्मारक और आश्रम बन गया हमने कहा कि आप आदेश और आज्ञा करें कि किस विषय पर बोलें? तब बोले थे गुरु पर बोला जाए।। उसी समय एक बार गुरु पर परिक्रमा हुई।। दादाजी ने इस मंत्र की उंगली पकड़कर प्रवेश करवाया था।।बुद्ध पुरुष अपने आप खुलेगा नहीं उनके सामने हम खुद जाना अपेक्षा मुक्त आत्म निवेदन करना।।

सर्व शास्त्र परोदक्ष: सुवच: सुंदर: स्वंग: कुलिन: शुभदर्शन: जितेन्द्रीय: सत्यवादि ब्राह्मण: शान्तमनस: पितृमाृहितै युक्त: सर्वकर्मो परायण: आश्रम: देशवासी: च गुरुरैव विधियते करोतिजीवं कल्याणं गुरुश्रेष्ठ: स कथ्यते।।

मिट्टी कुछ नहीं बोलती।

इस मंत्र से श्लोक से हमने प्रवेश किया था।। बापू ने कहा कि आश्रित में लोभ नहीं होना चाहिए अलुब्धप के लक्षण है।। मुझे और आपको बुद्ध पुरुष के पास मिट्टी बनना पड़ता है।।मिट्टी आश्रितों को समर्पित होने में मदद करती है।।मिट्टी कुछ नहीं बोलती। खुदान करते हैं पानी डालते हैं पिंड करते हैं चाक पर चढ़ाते हैं चाक घुमाया जाता है, कुंभकार चाहे वैसा आकार देता है,मिट्टी कुछ नहीं बोलती।। गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है ऐसा कबीर ने कहा है। फिर कुंभकार पीटता है,धूप में सुखाता है निंबाड़ा में आग में पकड़ता है,मिट्टी कुछ नहीं बोलती।।कभी गेरुआ कभी सफेद काला रंग लगाते हैं बाजार में बेचने जाता है सौदा होता है मिट्टी कुछ नहीं बोलती।। लेने वाला टकोरे मारकर चारों ओर पीटकर खरीदता है, मिट्टी कुछ नहीं बोलती।। ग्राहक खरीद कर ले जाता है गृहिणी सर पर रखकर पनघट पर पानी लेकर जाती है,घट के गले में फंदा डालते हैं।। मिट्टी कुछ नहीं बोलती पानी में डूबोते हैं कुए के साथ टकराता है।। कुछ नहीं बोलती घड़े से पानी झलकता है मिट्टी कुछ नहीं बोलती।। खेल-खेल में गुरु जी का बेटा मटकी पर प्रहार करता है ठीकरे ठीकरे हो जाती है मिट्टी कुछ नहीं बोलती।। फिर फेंक दिया जाता है अलग-अलग ठीकरें का उपयोग होकर मिट्टी मिट्टी हो जाती है मिट्टी कुछ नहीं बोलती।।
बापू ने कहा कि एक महापुरुष मलिक दयाल जी ने कहा गोसबंद-कान बंद रखना, चश्म- बंद आंखें बंद रखना,लबबंद मुंह बंद रखना।अंदर की आवाज सुनने के लिए बाहर की आवाज ना आए।। गोपियों को सिर्फ बांसुरी की आदत लगी थी।। बापू ने कहा कि तथाकथित धर्म वाहक भी करप्ट है।८० प्रतिशत करप्ट है। गरीब है।।इतिहास में लिखा है पाप विमोचन पत्रिका मुक्ति का कार्ड बांटा गया था, इतने डॉलर में कार्ड ले जाओ वहां दिखाना आपको स्वर्ग मिल जाएगा! एक बंदा निकला- मार्टिन लूथर उसने सभी पत्रिका का ढेर लगाया।। सभी क्षेत्र गरीबी मिटाने का प्रयत्न करते हैं लेकिन प्रमाणिकता कितनी? साधु कर सकता है साधु स्थापित संस्था कर सकती है।।गरीबी मिटेगी हटेगी साधु के मिलन से ही।। बापू ने कहा नाथ आज में काहु न पाया! गुरु मान नहीं देता ईमान देता है।।कृपा जैसी कोई संपदा नहीं।। कृपा कृपणता मिटा देती है।। नेटवर्क बनाकर शोषण करते हैं तो हम गरीब है।। अत्यंत गरीब लोगों की ईमानदारी के बारे में भी बापू ने कहा।।

बुद्ध पुरुष सद्गुरु वो है जिसकी वाणी में सर्वशास्त्र प्रकट होते हैं


सद्गुरु में चार वस्तु देखनी है। स्वभाव ,प्रभाव नहीं।।सद्गुरु स्वयं चमत्कार है।।सद्गुरु का स्वरूप, रूप नहीं, स्वरूप देखो।। सद्गुरु का स्वधर्म देखो। और सद्गुरु का स्वधाम निजधाम देखो।। बापू ने एक वार्ता कही तिबेटीयन गुरु के पास एक युवा भीख्खू गया भोला उपदेश दो। गुरु ने कहा एक साल चावल कूटते रहो।।एक साल तक गुरु के पास भी ना गया। गुरु का निर्वाण का समय आया गुरु ने कहा अब चंद घंटे बाकी है। जाने का समय है यह संस्था किसी योग्य हाथों में सौंपना चाहता हूं।। परीक्षा करके चुनाव करूंगा उत्तराधिकारी कौन बनेगा।।सभी पुराने शिष्यों को कहा कि कुटिया के दरवाजे पर कुछ लिखकर चिपका देना कि आपने मुझसे क्या पाया है।। और वहां सब ने मिलकर लिखा:मन दर्पण है लेकिन धूल लग चुकी है।। गुरु ने सुबह देखा और कहा कि आपने मुझे ठीक समझा नहीं।। उसे बुलावो जो चावल कुटता है,बुलाया गया गुरु ने पूछा कि आप क्या कहना चाहते हैं।वह लोग तो अनुयाई नहीं बन सकते।। वह बोला मैं तो अनपढ़ हूं मैं सिर्फ चावल कुटता हूं। मैं बोलता हूं आप लिख लो।।आपके हवामान में रहने से मन ही नहीं बचा तो रज कहां लगेगी! और उसे ही उत्तराधिकारी बनाया गया। फिर तिलक कर कर गुरु ने कहा कि मैं आज जा रहा हूं तुम भी जल्दी निकल जाना क्योंकि यह लोग तेरी हत्या कर देंगे।। बापू ने बताया यह मंत्र जहां मैं पढ़ता था तब गुरु का संकेत है बुद्ध पुरुष सद्गुरु वो है जिसकी वाणी में सर्वशास्त्र प्रकट होते हैं सब शास्त्र में पारंगत है। कर्णप्रिय सुवचन बोलते हैं प्रत्येक चेष्टा अनूठी होती है खानदान होते हैं मैत्री का मतलब मित्र मुक्त मैत्री कोई मित्र नहीं है।।तुलसी के चार गुरु थे: एक दासी, पालक दासी,दूसरा निज गुरु नरहरिदास तीसरा सद्गुरु रामचरितमानस और चौथा गुरु त्रिभुवन गुरु भगवान शिव।।

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