रामकथा,अध्यात्म की यात्रा सुख की खोज नहीं है; सत्य की खोज है: सुख शाश्वत नहीं है,सत्य शाश्वत है, धर्मयात्रा भी सुख की खोज नहीं सत्य की खोज है
आनंदपुर डेस्क :
सेवा स्मरण भूमि से प्रवाहित कथा के आठवें दिन बापू ने बताया कि जब दादा जी से मैं रामचरितमानस शिख रहा था तो ऐसी बात हुई थी कि पूरा रामचरितमानस नव दिन में यदि पूर्ण रूप से गाया न जाए, हर एक प्रसंग पात्र और सूत्र को न्याय ना दिया जाए तो किस रूप में गायन किया जाए? तब आदेश के रूप में बताया गया कि पूरा बालकांड न ले सके तो तीन बात पर विशेष ध्यान देना: शिवचरित्र अवश्य सुनाना।क्योंकि शिवचरित्र रामकथा का उद्घाटक तत्व है। दूसरी बात रामनाम की महिमा आवश्यक है।। चारों युग में नाम का ही प्रताप है और अहल्या प्रसंग हो सके तो कहना क्योंकि यह बगिया वाटिका में से किस को चुने कीसे छोड़ दे?हमने कोयंबतूर में मानस अहल्या कथा गायन किया था।। अयोध्या कांड में दो बात पर बल दिया गया: वाल्मीकि राम जी को १४ स्थान बताते हैं वह प्रसंग और परमात्मा का धाम।। वहां चित्रकूट की कथा पर विशेष ध्यान देना।।
रामकथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु।

जैसे श्री कृष्ण की उपासना में वृंदावन की विशेष महिमा वैसे राघव राम की उपासना में चित्रकूट है।। और उसमें भी भरत मिलाप की कथा और पादुका पर विशेष बल देना।।पादुका प्राण है।। अरण्यकांड में दो बात पर विशेष संकेत हुआ:राम गीता और शबरी का प्रसंग सुनाना।। किष्किंधा कांड में ऋतु वर्णन खास कहना जहां चौपाई की अरधाली में ञतु का और बाकी की अरधाली में उपनिषद के रूत का वर्णन है।। अध्यात्म की यात्रा सुख की खोज नहीं है।। आप नासीपास होंगे उसे स्वांत: सुखाय कहकर मन को मनाएंगे।। अध्यात्म यात्रा सत्य की खोज है।। सुख के कई प्रकार है, सत्य के प्रकार नहीं।। सुख शाश्वत नहीं है,सत्य शाश्वत है।। सुख को प्रलोभन से अलग-अलग परिभाषित कर सकते हैं।।कथा भी सुख की यात्रा नहीं। सर्वदा सुख आए तो समझना यह सत्य है।।धर्मयात्रा भी सुख की खोज नहीं सत्य की खोज है।। धर्म न दूसर सत्य समाना।। हमारे गुजरात में भोलाभाई पटेल ने कहा था कि कुंती ने कृष्ण से पूछा धर्म का फल क्या है? कृष्ण ने कहा धर्म का फल दुख के सिवा कुछ नहीं।। इसका मतलब धर्म छोड़ने की बात नहीं। यही मार्ग सत्य की खोज का मार्ग है।। सुंदरकांड में हनुमंत चरित्र और त्रिजटा के बारे में केंद्रित करना।। लंकाकांड में एक ही घटना धर्मरथ पर सुनाना।। विनोबा जी ने हिंदू धर्म की परिभाषा सभी धर्मों का सार लेकर बताई है।।विनोबाजी १८ भाषा जानते थे संस्कृत के प्रकांड पंडित थे।।विनोबा जी ने कहा हिंदू धर्म यह है हिंसा से जिसका चित् दुभाये वो हिंदू है।व्यवस्था के रूप में वर्ण की बात का लेकिन ऊंच-नीच के लिए नहीं।। मैं ऊपर बैठा हूं आप नीचे बैठे हैं। भेद नहीं व्यवस्था है।। आश्रम संयम संयम के रूप में दिखाएं।।आप इतनी साल से जानते हैं तो भेद का तो सवाल ही नहि। आपको मालूम मेरा एक क्रम रहा है हर घर से भिक्षा लेता हूं और क्रम में मुस्लिम का, दलित का, देवीपूजक का, जिसका भी घर आया वहां से मैं भिक्षा लेता हूं।। गीता में भी समता शब्द पर बहुत बल दिया है।। यदि अपेक्षा बढी पवित्रता कम होगी।। जो गौ भक्त है। वेद को जो मां समझता है। मूर्ति का अनादर न करें। पुनर्जन्म में आस्था रखता हो। प्रत्येक भूत के अनुकूल जीने की कोशिश करता हो वह हिंदू है।। उत्तरकांड में भुसुंडि चरित्र और गरुड़ के सात प्रश्न दोनों को बहुत महत्व देना।।
तो आज अयोध्या कांड में पादुका पर ज्यादा स्पर्श करूंगा।।अयोध्या में सुख बढा, राम का वनवास हुआ। चित्रकूट में स्थिर हुए।।अवध में दशरथ का मृत्यु,सिंहासन पर कौन बैठे? सभा हुई और आखिर निर्णय हुआ चित्रकूट जाए।।प्रेम देखना है तो भरत का दर्शन करो।। चित्रकूट में सब मिले और जाने का वक्त हुआ जनकपुर और अवधपुर वहां से विदा ले रहे हैं।कैसे जाएंगे,कैसे जिएंगे? चैतन्य परंपरा का सूत्र है साधु का संग ना हो, संग हो तो वियोग ना हो, वियोग हो तो हमारा प्राण निकल जाए।। जाते वक्त पादुका मांग ली।।वहां शब्द है चरणपीठ। जहां श्रेष्ठों का चरण रहता है वह चरणपीठ है।। बुद्ध पुरुष का स्वधाम उसकी पादुका है।भागवत के ११वे स्कंध में पांचवें अध्याय में ४२ वां श्लोक है जिसको अपने ठाकुर के स्वपादने लगन लगी गई है,कभी हमारे मन में विकर्म आ जाए तो मायूस ना होना, वह अंदर बैठा धो देगा।। बापू ने कहा कि विज्ञान मार खा जाएगा पादूका का फोटो खींचेंगे गुरु की फोटो निकलेगी।। अरुणाचल का रमण महर्षि प्रमाण है।। जर्मन साधिका को कहा था कि पादुका ले जाओ जब तेरा अंतःकरण बिलकुल निर्मल होगा तब तुझे पादुका नहीं मैं नजर आऊंगा।। और यह महिला ने प्रयोग किया। तस्वीर खींचने की कोशिश की, बार-बार और आखिरी बार तस्वीर खींची तो गुरु की तस्वीर निकली।।फिर भी गुरु परीक्षा का विषय नहीं है।। गुरु सत्ता नहीं है,गुरु सत है।। सत्ता तो नाशवंत है गुरु शाश्वत है।। पादुका शब्द में पा- पार कर देना तार देना,उद्धार कर देना। किससे पार करना? दुखों से पार कर देती।दू-शब्द है। तीन दुख है ज्ञान में आत्मा विस्मृति ही दुख है,भक्ति में हरिस्मरण का विस्मृति दुख है। कर्म में उत्तरदायित्व की विस्मृति दुख है।। काल से भी पार कर देती है।। पादुका कालातीत और दुखातित कर देगी।। कुछ निष्ठा व्यक्तिगत रखो।सार्वजनिक मत करो जैसे कि गुरु का चरणामृत,गुरु का ही ध्यान, गुरु का जूठन खाना इसे व्यक्तिगत रखो।। क्योंकि अंधश्रद्धा बढ़ेगी। गुरु का बचा हुआ नहि,पचा हुआ खाना।।गुरु की प्रवाही पवित्र परंपरा का पान करो वह चरणामृत पान है।।
प्रभु कर कृपा पांवरी दीन्ही।
सादर भरत शिस धरि लीन्हि।।
बापू ने कहा चैत्र नवरात्र शुरू हो रहा है जितना हो सके रामचरितमानस का पाठ करो। गा सको तो गाओ।।
फिर अरण्यकांड चित्रकूट से भगवान स्थानांतरित हुए।।अत्रि के पास आए। शरभंग और सुतीक्षण का प्रसंग और सुंदरकांड एवं लंका कांड के विविध प्रसंग को स्पर्श करते हुए कथा को आखिरी तक ले गए।।
कल इस रामकथा का विराम दिन है और कथा सुबह ९ बजे शुरू होगी।।



